Monday, 23 January 2017

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लंढोर जाएंगे कुछ अलग पाएंगे

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भोर जब नहायी हुई सुबह में बदलने को होती है,,, एक जादुई समां संगीत सुनाता है,,,आसमान की छटती कालिमा कब उजली नीलिमा में बदल जाती है, पता ही नहीं लगता,,,बस महसूस होता है की कुछ क्षण पहले तो आकाश का रंग कुछ और था अब कुछ और... लेकिन लंढोर में कुछ और भी होता है,,, सुबह जब यहां अंगड़ाई लेती है,,,तब वादियों से उठता कुहासा उसे आगोश में भरने लगता है,,, तब यह इलाका हौले-हौले उठते कुहासे, हरियाली और लाल छतों के बीच ध्यान योग में डूबा सा लगता है। यहां आना किसी ख्वाब से रु-ब-रु होने सरीखा है। रूह के रूहानी अहसासों से घुल-मिल जाने की तरह।
सूरी के पास एक छोटी-सी जगह है। नाम है लंढोर। मसूरी के ग्लैमर और कोलाहल वाले मॉल रोड से कोई चार-पांच किलोमीटर दूर। शांत। शुद्ध हवा, ऊंचे पहाड़ों की कतारें, वादियां। देवदार के हजारों वृक्षों का सम्मोहित कर देने वाला संसार। कहा जाता है जब अंग्रेज यहां आए तो मोहित हो गए। उन्होंने इस शांत स्वर्ग में कॉटेज बनाए, एस्टेट खड़े किए। यहीं के होकर रह गए। बाद में लंढोर साहित्यकारों, कवियों और दार्शनिकों की पसंदीदा स्थली बना। यहां की फिजाओं में अब भी अलग ही बात है, अलग ही संगीत। बेहद मौलिक है, बेहद प्योर। लंढोर अगर अब भी उतना ही हसीन और अलौकिक बना हुआ है, तो शायद इसीलिए, क्योंकि यहां प्रकृति से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई। यहां चुनिंदा लोग रहते हैं। रहने की शर्त यही है कि प्रकृति से कोई छेडख़ानी नहीं। जो कुछ जैसा है, वह वैसा ही रहेगा। उन्हें इसी के बीच एडजस्ट होना है। 

कुछ अलग है लंढोर
जब क्वीन ऑफ हिल्स की बात होती है, तो उसका मतलब मसूरी के साथ उसकी पड़ोसी बहन लंढोर से भी होता है। जैसे-जैसे आप इसके सीमेंटनुमा संकरे घुमावदार रास्तों से ऊपर की ओर बढ़ेंगे, यह इलाका अपने सुहानेपन की परतें खोलने लगेगा। देवदार, हिमालयन ओक, चीड़ पाइन, ब्लू पाइन और तमाम पहाड़ी पेड़-पौधों के बीच फूलों की छटा मिलेगी। पक्षियों का एंबियंस होगा। यह जगह अपने आपमें एक जीती-जागती बर्ड सैंक्चुअरी भी है। यहां दिनों-दिन पक्षियों की प्रजातियां बढ़ रही हैं। कुछ नए मेहमान पक्षी भी आना-जाना बढ़ा रहे हैं। मोटे तौर पर यहां 350 पक्षियों की प्रजातियां तो हमेशा मिल जाएंगी। बरसात की हल्की फुहारों के बीच यहां पहुंचेंगे, तो ऊंचाई पर धुंध के बीच फुहारें टप-टप करती हुई मिलेंगी। यहां सबसे ऊंचाई पर पहुंचने के बाद सामने दिखने लगेंगी हिमालय रेंज की प्रसिद्ध चोटियां। जाड़ों के मौके पर ये चोटियां बर्फ की सफेद चादर ओढ़े होती हैं और सूरज की किरणें पड़ते ही चांदी-सी दमकती हैं। नीचे हरियाली से भरी वादियां और ऊंचे देवदार वृक्ष। यह इलाका तिब्बत का करीबी पड़ोसी भी कहा जाता है। कहीं भी जाइए। चारों ओर नजर दौड़ाइए तो हर पल एक अलग खुशनुमा कैनवस दिखेगा पास से लेकर दूर तक। 

अंग्रेजों ने बसाया था 
अंग्रेजी सेना का अफसर कैप्टेन यंग 19वीं सदी के शुरू में यहां पहुंचा। यहां सबसे पहला पक्का घर भी कैप्टन यंग का ही बना था। फिर यहां सेना की छावनी बनी। इस छोटे, खूबसूरत और शांत कस्बे को 1827 में ब्रिटिश आर्मी ने बसाया। दक्षिण- पश्चिम वेल्स के चारमोरथेनशायर के एक गांव लैंडवोरर के नाम पर इस जगह को नाम मिला लंढोर। यह मसूरी से करीब 300 मीटर और ऊपर है। 

रस्किन बांड का एक घर 
जब आप मसूरी से लंढोर के सीधे और घुमावदार रास्तों से ऊपर जा रहे होंगे, तो कुछ छोटे-बड़े पक्के मकान मिलेंगे।आपको शायद पता भी नहीं चलेगा कि इन्हीं में एक घर प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड का है। रस्किन बचपन से यहीं रहते हैं। उनकी तमाम कहानियों में यहां की खूबसूरती, निश्छलता झांकती है। कुछ और प्रसिद्ध हस्तियां, जैसे-विक्टर बनर्जी, टाम आल्टर और भी कई लोग थोड़ा और ऊपर की ओर जाने पर सामने नीचे की ओर नजर आने वाली वादियों में रहते थे।
किसी जमाने में यहां अंग्रेज, स्कॉटिश और आयरिश लोगों ने बड़े मन से एस्टेट बनवाए। अब यहां बहुत कम अंग्रेज हैं। हां, एंग्लोइंडियन जरूर मिलेंगे, जो यहां के बाशिंदे हैं। पुरानी स्मृतियां और धरोहरें हर ओर बिखरी हैं। तमाम स्ट्रीट्स और जगहों के नाम विदेशी ही हैं। हर एस्टेट या बंगले की ब्रिटिश राज से जुड़ी एक कहानी है।
यहां ब्रिटिश जमाने का एक कब्रिस्तान है। बहुत से ब्रितानी आज भी अपने पुरखों की कब्रों पर आते रहते हैं। यहां के ज्यादातर बड़े बंगले या एस्टेट, जहां कभी अंग्रेज रहते थे, उन्हें देश के जाने-माने उद्योगपतियों या हस्तियों ने खरीद लिया है। सचिन तेंदुलकर ने भी पिछले दिनों यहां एक आशियाना खरीदा था। एनडीटीवी के प्रणव रायराधिका राय का एक घर यहीं है। विशाल भारद्वाज भी रस्किन के पड़ोसी हैं।

खूबसूरत चर्च 

एक जमाने में यहां चार चर्च थे। दो चर्च एकदम मुकम्मल हाल में हैं। उनका आर्किटेक्ट और साज-सज्जा कमाल की है। वर्ष 1840 में बने सेंट पॉल चर्च के अंदर घुसिए तो आंतरिक सादगीभरी सजावट मुग्ध करती है। कुछ साल पहले इसकी हालत खराब होने लगी थी, तब इसका जीर्णोद्धार किया गया। चर्च के ठीक बगल में है छोटा- सा बाजार, जहां चार दुकानें हैं। ये चार दुकानें डेढ़ सौ साल पहले से हैं। टिप टॉप टी शॉप के मालिक विपिन प्रकाश बताते हैं कि यह दुकान उनके पितामह ने 130 साल पहले खोली थी। सप्ताहांत में इन दुकानों पर करीबी स्कूल वुडस्टाक के बच्चों की भीड़ सजती है। पर्यटकों के लिए यह जगह खाने- पीने के लिए पसंदीदा है। लंढोर में प्रवेश करते ही घंटाघर के पास भी एक बाजार है, जो नए और पुराने का संगम है। ज्यादा बेहतर हो कि आप अगर मसूरी से यहां आ रहे हों तो पैदल ही आएं। ऐसे में प्राकृतिक नजारों का आनंद ही कुछ और होगा।

प्रकृति से लगाव 

वैसे, लंढोर कम से कम यह तो सिखाता है कि प्रकृति को समझो। इसे अगर इसकी शर्तों पर अपनाओगे या महसूस करोगे तो स्वर्ग कहीं और नहीं, बल्कि इसी धरती पर है।एक बात जो मैंने लंढोर की हरियाली के बीच महसूस की। यहां आते ही मूड बदल जाता है। तनाव उडऩछू। शरीर में न जाने कहां से स्फूर्ति आने लगती है। थकावट काफूर। दिमाग तरावट का अनुभव करता है। शायद यह आपने भी महसूस किया होगा जब आप शहर के कोलाहल के दूर किसी अच्छे से पार्क, अभयारण्य या प्रकृति की स्वाभाविक दुनिया में जाते हैं, अचानक आपका दिमाग एक अलग तरह से काम करना शुरू कर देता है, आप कुछ बदल जाते हैं। तन-मन पर सुख की फुहारों की बौछार होती प्रतीत होती है। सचमुच प्रकृति, हरियाली, हरे-भरे वृक्षों का मोल इतना ज्यादा है कि हम समझ ही नहीं सकते। हमने अपने शहरों को कंक्रीट के जंगलों में बदल जाने दिया, खुद उसी का हिस्सा बन गए। 
अगर लंढोर के लोग चाहते तो यहां भी मसूरी जैसे बाजार बन जाते, भीड़ आ जाती, ग्लैमर दिखने लगता, लेकिन तब असली नेचर जरूर गायब हो जाता। अपनी ही लय में मस्त, मगन और शांत संगीत में बहने वाले लंढोर को आप फिर कैसे पाते। अगर आप मसूरी जा रहे हों तो लंढोर जरूर जाइए। शांति से जाइए। प्रकृति की उस शांति को महसूस करिए, जो बरसों बरस आपको याद रहेगी। दिल्ली से मसूरी 269 किमी. की दूरी पर है। आप सड़क और हवाई मार्ग से वहां पहुंच सकते हैं
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