Tuesday, 13 June 2017

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कुल्लू-मनाली A Perfect Place

manali-Rohtang-Pass
हिमालय की गोद में बसे कुल्लू और मनाली में आप प्रकृति के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक समृद्धि की खूबसूरत झलक भी पा सकते हैं। चुंबकीय आकर्षण वाले इन स्थानों पर जो एक बार आ जाता है, वह बार-बार आना चाहता है... 

हरी-भरी घाटियां, किसी सुरमयी साज की तरह कानों में रस घोलते झरने, बर्फ से लकदक ऊँची-ऊँची पहाड़ियां, उनसे निकलती चमकती किरणें, कल-कल करतीं तेज गति से बहती नदियां, नागिन की तरह बलखाती खूबसूरत सड़कें, हवा में लहराते सेब, नाशपती, अनार और प्लम के बगीचे। घने जंगल... सुकून भर शीतल एहसास, स्वच्छ जलवायु। कुदरत के बारे ने जितनी सुंदर कल्पना कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं हिमाचल के ये पर्वतीय नगर। गर्मी के मौसम में यहाँ का नजारा कुछ ऐसा ही होता है। लोग मंत्रमुग्ध हो यहीं खो जाते है। नवविवाहित युगलों के लिए भी हनीमून का पसंदीदा पड़ाव है मनाली। उत्तरी भारत के हिमाचल प्रदेश स्थित कुल्लू जिले का यह शहर बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग का हॉटस्पॉर्ट रहा है। यह कुल्लू से रोहतांग दर्रा होते हुए लेह-लद्दाक की और जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 21 पर स्थित है, जो साहसिक सैलानियों को अपनी ओर खींचता है। यह पूरा रास्ता कुदरत से एक बढ़कर एक नजारों से पटा पड़ा है। आजादी के बाद जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू गर्मियों की छुट्टियां बिताने यहां पहुचें तो मनाली का नाम दुनिया में चर्चा का विषय बना। यहां भारतीय सभ्यता-संस्कृति की अमूल्य धरोहरों को प्राचीन समय से ही बड़ी शिद्धत ओर खूबसूरती से संजोकर रखा गया है। कुल्लू घाटी के मंदिर, कुल्लू दशहरा, मणिकर्ण, रोरिक कला संग्रहालय यहां की पहचान है। गर्म कुंड भी यहां के खास आकर्षण है। घाटी की ऊँची पहाड़ियों पर सेब के बगान और निचले क्षेत्रों में अनार, प्लस, नाशपाती आदि के बगान है। यहां पर्यटन के साथ फलों के बगीचे भी आजीविका के साधन हैं।

रोहतांग पास
Kullu-Manali
मनाली का सबसे बड़ा आकर्षण 12 महीने बर्फ से ढका रहने वाला रोहतांग पास है। यह मनाली से 50 किमी. दूर समुद्र तल से 13050 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह सैलानियों को ही नहीं, पर्वतारोहियों को भी खूब लुभाता है। रोहतांग पास कभी भारत व मध्य एशिया के कई देशों की संस्कृतियों को मिलाने का मुख्य मार्ग था। प्राचीन समय में पंजाब के लाहौर व अमृतसर से लेकर अफगानिस्तान, समरकंद, तुर्किस्थान, यारकंद और तिब्बत, लेह, चीन, भूटान, नेपाल, मंगोलिया तक यह व्यापर का प्रमुख जरिया था। इस रस्ते से रेशम, चरस-अफीम, अनाज व तेल के साथ बड़े पैमाने पर घोड़ों का कारोबार किया जाता था। यह अब व्यापारिक मार्ग तो नहीं रहा, पर पर्यटन के लिहाज से यह स्थान बढ़ लोकप्रिय है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने रोहतांग में पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब यहां रोजाना केवल 1200 वाहनों के प्रवेश की शर्त लगा दी है और इसके लिए ऑनलाइन तथा मनाली में ही पैसे देकर परमिट लेना जरूरी कर कर दिया गया है।

सर्द मौसम की सौगात कुल्लू की शॉल
स्थानीय बाशिंदो के हुनरमंद हाथों से तैयार विशेष गर्म उत्पाद है कुल्लवी शॉल के नाम पर यहां की 'भुट्टिको' विश्व में एक ब्रांड बन चूका है। भुट्टिको के अध्यक्ष सत्यप्रकाश ठाकुर कहते हैं, 'इस कारोबार को बढ़ावा देने में सहकारिता आंदोलन का बड़ा हाथ रहा। लोगों ने मिलकर सहकारी समितियों का गठन किया और क्रमश: उधोग स्थापित क्र दिए। कुल्लू घाटी सहित प्रेदश के जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर ऊनी वस्त्रों का उत्पादन बहुत पुराना है, लेकिन 20वीं सदी में यहां सुनियोजित व संगठित रूप में हथकरघा उद्योग विकसित हुआ। शॉल के अलावा यहां की कुल्लवी टोपी, मफलर, मोज़े आदि भी हथकरघा के विशेष उत्पाद हैं। हथकरघा यानि हाथ से चलने वाला लकड़ी का विशेष यंत्र, जिसके ताने-बाने में रंग-बिरंगे धागों को पिरोकर पहले एक पट्टी तैयार की जाती है, फिर विभिन्न उत्पाद तैयार किए जाते हैं। कुल्लवी उत्पादों के विक्रेता लोमहर्ष ठाकुर कहते हैं,'आपको एक बात का खास ख्याल रखना होगा कि हथकरघा के नाम पर आप ठगे न जाएं, क्योंकि कई दुकानदार यहां पर मैदानी राज्यों में पावर लूम से तैयार गर्म वस्त्रों को भी कुल्लू हैंडलूम के नाम से बेचते हैं।'

रोरिक आर्ट गैलरी
यह स्थान कुल्लू के ऐतिहासिक क्षेत्र नगर से कुछ किमी. ऊपर है, जो आज एक विकसित पर्यटन स्थल तो है ही, कला साधकों के लिए भी किसी कुंभ से कम नहीं। कुल्लू को विश्व मानचित्र पर पहचान दिलाने का श्रेय रुसी चित्रकार एवं साहित्यकार निकोलस रोरिक को भी जाता है। उन्होंने अपने कुची से पहाड़ों को एक न्य रूप दिया और हिमालयी सभ्यता को ऐसे उकेरा कि वह दुनिया भर में लोकप्रिय हो गई। नग्गर स्थित यह हॉल एस्टेट, जिसमें रोरिक रहा करते थे, आज आर्ट गैलरी में तब्दील हो गया है। यहां उनकी हजारों पेंटिंग्स को बखूबी सहेज कर रखा गया है। यहां एक संग्रहालय और ओपन थियेटर भी है। 1923 में रोरिक अपनी पत्नी व दो बच्चो के साथ भारत आए थे। उनके चित्रकार पुत्र स्वेतोस्लाव रोरिक ने 1944 में भारतीय स्वाक फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री देविका रानी से विवाह किया था। कहते हैं, अपने पति हिमांशु राय के निधन और बॉम्बे टॉकीज को छोड़ने के बाद अभिनेत्री देविका रानी लगभग टूट-सी गई थीं। तभी उनकी मुलाकात रुसी चित्रकार और निकोलस रोरिक के पुत्र स्वेतोस्लाव रोरिक से हुई और कुछ ही समय बाद दोनों ने शादी कर ली। दिसंबर 1947 में निकोलस रोरिक के देहांत के बाद बहू देविका रानी अपने ससुर के सपने को पूरा करने में जुट गई। दरअसल, निकोलस रोरिक हिमालय में एक संस्थान स्थापित करना चाहते थे। इसी उदेश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 1928 में मंडी के राजा से यहां का हॉल एस्टेट खरीदा था, जिसे आज संग्रहालय के स्वरूप दिया गया है।

विदेशियों की पसंद कसोल
कसोल घाटी विदेशी पयर्टकों की खास पसंद है। यहां इजरायली जैसे रच-बस गए हैं। दशक भर से यह क्षेत्र देसी सैलानियों के लिए कुंभ मेले के समान हो गया है। यहां आने वालों में 90 फीसद युवा होते हैं, जो एडवेंचर और मौज-मस्ती के लिए आते हैं। वे यहां खुले आसमान के नीचे रंग-बिरंगे कैंपिंग साइट में ठहरते हैं। रेस्तरां व कैफ़े में भी इजरायलियों की भीड़ लगी रहती है। मणिकर्ण घाटी की कसोल सहित रसोल, छलाल, जरी, तोश व खीरगंगा में भी हलचल रहती है। वे यहां की प्रकृतिक वादियों से मिलने वाले आनंद को अधिक पसंद करते हैं।

मलाणा में सबसे पुराना लोकतंत्र
मणिकर्ण घाटी के मलाणा' गांव के विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र है। माना जाता है कि इसका संचालन यहां के देवता 'जमलू' करते हैं। इस गावं में सदियों से ग्राम स्वराज प्रणाली चल रही है। इसके लिए परिषद का गठन किया जाता है, जिसमें 11 सदस्य होते हैं। चार वार्डों से सदस्यों का चुनाव होता है। प्रशासनिक करवाई के लिए दो सदन बनाए गए हैं। गांववासियों के विवाद को इन्हीं सदनों में निपटाया जाता है। फिर भी समस्या हो तो देवता जमलू कि अदालत मने निर्णय होता है, जो सर्वमान्य होता है। आज भी यह परंपरा है।

हिडिंबा मंदिर
देवी हिडिंबा का मंदिर मनाली बाजार से लगभग तीन किलोमीटर दूर पुरानी मनाली में देवदारों के घने जंगल के बीच स्थित है। यह पैगोडा शैली में बना काष्टकला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के गर्भगृह में माता कि पाषाण मूर्ति है। मान्यता है कि जब पांडव वनवास में थे, उस दौरान भीम ने हिडिंबा के राक्षक भाई को मरकर क्षेत्र को उसके आंतक से मुक्ति दिलाई थी। इसके बाद हिडिंबा ने उनसे विवाह कर लिया। कहते हैं कुल्लू राज परिवार के पहले शासक विहंगमणिपाल को माता ने ही यहां का राजकाज बख्शा था। यही कारण है कि राज परिवार आज भी माता को अपनी दादी मानता है।

लोक गीतों में कुलंतापीठ
कुल्लू को लोक गीतों में कुलंतापीठ अर्थात रहें योग्य अंतिम स्थान के नाम से संबोधित किया जाता है। कुल्लू का प्राचीन नाम कुलता है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण व रामायण में भी मिलता है। इस क्षेत्र के प्राचीनतम ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुल्लू के राजा द्वारा जारी किया गया सिक्का भी है। इस पर लिखा है -रज्न कोतुलतरया वीरयस्सय अर्थात कुलता या कुलतस का राजा। यधपि राज वंशावली में इस राजा का नाम नहीं मिलता। यह सिक्का पहली-दूसरी शताब्दी का माना जाता है।

सांस्कृतिक धरोहर कुल्लू दशहरा

 Kullu Dussehra 
 17वीं शताब्दी में कुल्लू के राजपरिवार द्वारा देव-मिलन से शुरू हुआ महापर्व कुल्लू दशहरा आज भी घाटी की देव संस्कृति को जिन्दा रखने का महत्वपूर्ण प्रयास है। जिला लोक संपर्क अधिकारी शेर सिंह बताते हैं, यह पर्व जहां कुल्लू के लोगों के भाई-चारे का मिलाप है वहीं घाटी में कृषि व बागवानी कार्य समाप्त होने के बाद ग्रामीणों की खरीदारी का भी प्रमुख पर्व है। यह दशहरा केवल कुल्लू व हिमाचल का मेला नहीं, बल्कि प्रचीन संस्कृति और विविधता में एकता का अध्ययन एवं शोध करने वालों के लिए बड़ा अवसर है। इस दौरान मेला स्थल ढलपुर मैदान की छटा देकते ही बनती है। हजारों लोगों का हुजूम रंग-बिरंगे परिधानों में अलग-अलग फूलों के गुलदस्ते के समान लगता है। मेले के आरंभ में जब भगवान सघुनाथ की शोभायात्रा निकलती है, तो ऐसा लगता है मानो मानव रूपी समुद्र में श्रद्धा के लहरें उमड़ रही हों। इसमें न रामलीला होती है, न रावण-कुंभकर्ण-मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। इसकी अलग सांस्कृतिक पहचान है। वर्ष 2015 में दशहरे के दौरान पारंपरिक परिधानों में सजी लगभग 13 हजार महिलाओं ने कुल्लवी नाटी प्रस्तुत किया था, जिसे 'गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में शामिल किया गया था।

सर्द घाटी में गर्म व्यंजनों की महक
कुल्लू के रेस्तरां, होटल और फ़ूड कोर्ट आदि में हर तरह का भोजन व देश-विदेश में प्रचलित व्यंजन उपलब्ध हैं। पर घाटी के अपने पकवानों और व्यंजनों की गर्म तासीर का अपना अलग ही आनंद है। ये सर्दी के लिहाज से पकाए जाते है, यह परंपरा आज भी चली आ रही है। इनमें प्रमुख रूप से गेहूं के आते से पकाया जाने वाला ' सिड्डू' है। इसे आटे को खट्टा करके बनाया जाता है, जो ओवल आकर का होता है।
लोई के अंदर स्वाद के हिसाब से अखरोट, मूंगफली, अफ़ीमदाना का मीठा या नमकीन पेस्ट भरा जाता है। इसे मोमोज की तरह पकाया जाता है और चटनी के साथ परोसा जाता है। यहां के विभिन्न क्षेत्रों में आटे के मीठे अथवा नमकीन बबरू, आटे की घी-खिचड़ी, चावल व गेहूं के आटे के चिलडे व अस्कलू, मक्की की रोटी व साग सहित अन्य सभी तरह की दाल-सब्जियां बनाई जाती है। कुल्लू में स्थानीय लोग नाश्ते के लिए ढालपुर स्थित फ़ूड कोर्ट का रुख करते हैं।
 

ट्राउट मछली का निराला स्वाद
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कुल्लू घाटी में नॉन-वेज का इस्तेमाल सदियों से मुख्य आहार के तौर पर होता रहा है, लेकिन 20वीं सदी की शुरआती दौर में जब व्यास नदी में ट्राउट का बीज पड़ा तो यह की तस्वीर ही बदल गई। आज कुल्लू से लेकर मनाली तक व्यास नदी के किनारे ट्राउट मछली की संख्या लाखों में है और लाइसेंस पर इसका आखेट भी हो रहा है। पार्वती नदी सहित अन्य विभिन्न छोटे-बड़े नदी-नालों में भी इनका प्रजनन हो रहा है। कटराईं, रायसन, भुंतर, मणिकर्ण की तरह व साथ लगते इलाके ट्राउट उत्पादन के खास क्षेत्र हैं। यहां की ट्राउट मछली का स्वाद सैलानियों को खूब भाता है।

कुल्लू-मनाली के सैर?
वैसे तो यहां वर्षभर आ सकते हैं। पर मई व जून और सितंबर-अक्टूबर में जब दशहरा पर्व मनाया जाता है, तब घाटी में पर्यटन का अपना ही आनंद है। दिल्ली से सीधी वॉल्वो व दूसरी सामान्य बसें चलती हैं, जबकि चंडीगढ तक रेलगाड़ी से आने के बाद वहां से भी बीएस ली जा सकते है। दिल्ली व चंडीगढ़ से कुल्लू के समीप भुंतर हवाई अड्डे के लिए उड़ानें भी उपलब्ध हैं।

इन्हें भी जानें

  • मनाली आने वाले पर्यटकों की संख्या करीब 40 लाख सालाना तक पहुंच गई है।
  • यहां का नग्गर किला को अब पर्यटन निगम का होटल बन गया है, प्राचीन काष्टकुणी भवन निर्मणा शैली का बेजोड़ नमूना है।
  • पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी यहां प्रीणी में अपना घर बनाया।
  • सोलंगनाला के फातरु में स्की हिमालय ने 2011 में रोपवे का निर्माण किया। यह एक नये पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है।
  • हिम वैली अम्यूजमेंट एंड कल्चर पार्क व कल्चरल इंडिया ने मनाली से चार किमी. दूर बाहंग में सुदंर पार्क का निर्माण कर इसे अलग स्परूप प्रदान किया है।
  • मनाली से 20 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक गांव नग्गर है, जो कभी कुल्लू रियासत की राजधानी हुआ करती थी।
  • हिमचल प्रदेश के पंच महादेवों में से एक है कुल्लू के बिजली महादेव, जिनका स्थान यहां के देवी-देवताओं में सबसे अग्रणी है। उन्हें 'बड़ा देऊ' भी कहा जाता है।
  • चीनी यात्री हेनसांग ने 7वीं शताब्दी के दौरान 'कुलूत' देश का जिक्र किया है।

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