Wednesday, 13 September 2017

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Magical World Of Caves "Borra"

Borra-Caves-Araku-Valley-Entrance
भारत एक ऐसा देश है, जिसमें असीमित प्राकृतिक सौंदर्य समाया हुआ है। प्रकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ यहां विविधता भी प्रचुर मात्रा में है। कहीं भव्य इतिहास से साक्षात्कार कृते हुए किले हैं, तो कहीं गुफाओं का मायावी संसार है...

विजाग यात्रा के सिलसिले में अराकू से होते हुए बोर्रा केव में रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ, तो न जाने क्यों गुफाओं के मायावी संसार में रूचि जाग्रत हो गई। मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है जब हम विक्रम बेताल देखा करते थे, तो उसमें बेताल बार-बार विक्रम को कहीं गुफाओं में चले जाने की धमकी ही दिया करता था। गुफाओं का रहस्य और आकर्षण शायद उसी समय से मन के किसी कोने में अपनी जगह बनाए बैठा होगा। कुछ भी कहें बड़ा ही मायावी संसार है इन गुफाओं का। भारत में अनेक छोटी-बड़ी  गुफाएं हैं, जो किसी अजूबे से कम नहीं हैं। पाताल भुवनेश्वर, उदयगिरि की गुफाएं, अजंता एलोरा और बोर्रा केव्स इनमें प्रमुख हैं।

अरकू घाटी
अराकू घाटी, जी हैं मैनें जहां भी इसका नाम पढ़ा इसका परिचय एक हिल स्टेशन के नाम से ही मिला। नाम के साथ ही घाटी शब्द जुड़ा होने के कारण और पहले से ली हुई जानकारी हम भी इसे एक ऊंचाई पर बसा पर्वतीय स्थल समझने लगे, यह भम्र तब तक बना रहा जब तक वहां से वापस नहीं आ गए। जाते समय ट्रैन से जाना था, तो शायद उतना अंदाजा नहीं लगा हो कि हम पहाड़ी से डाउन को उत्तर रहे हैं। अनंतगिरि की पहाड़ियों में कॉफी बागान के पर्याप्त दर्शन हो रहे हैं, पर हम दक्षिण भारत में बसने वाले तो काफी बागानों के आसपास ही मंडराते रहते हैं, चाहें कूर्ग हो, चिकमंगलूर, सकलेशपुर और या फिर वायनाड-सब जगह कॉफी के ही बागान भरे पड़े हैं तो यह हमारे लिए को रूचि का विषय नहीं बने और हम यहां बागानों के बीच न रुक कर सीधे आगे बढ़ते रहे। अब सामने एक व्यू पॉइंट है, जहां से घना जंगल दिख रहा है, इधर भी पेड़ों का आकार कुछ-कुछ फूलगोभी या ब्रोकोली की तरह है। ठीक इसी प्रकार का जंगल हमने ऊटी में देखा वहां इसे शोलाज के नाम से जाना जाता है। यहां कोई विशेष नाम नहीं मालूम पड़ा तो ब्रोकोली या फूलगोभी का जंगल ही कह सकते हैं।
अब बोर्रा केव ज्यादा दूर नहीं है या यूं कहूं कि बस पहुंच ही गए। सुबह पांच बजे के उठे हैं आंखों में नीदं भी है पर अभी आगे पूरा दिन पड़ा है, क्योंकि रात के बारह बजे ट्रेन पकड़नी है, तो तब तक सोने का कोई नामों निशान ही नहीं है पर क्या करें, यह राह हमने खुद ही चुनी है तो आंखों में रह-रह कर आने वाली इस नींद के भी मजे ले लेते हैं। अरे ये क्या! कुछ लोगों ने झुंड बनाकर गाड़ी रुकवा दी। पर क्यों, कुछ नहीं चंदा मांगने का नया तरीका है! शायद कोई फेस्टिवल चल रहा है इन लोगों का। इसके लिए डंडे और रंग गुलाल का प्रयोग कर के आने-जाने वाली गाड़ियों को रोक रह हैं। दूसरी जगह हम कर भी क्या सकते हैं तो पैसे दे कर अपनी जान-छूडाई। दस पंद्रह मिंट के रस्ते में ऐसा हमारे साथ तीन जगह हुआ। मरता क्या न करता, तीनों जगह चुपचाप पैसे निकल कर दे दिए। अब तक हम बोर्रा केव के रेलवे स्टेशन पहुंच गए हैं। यहां से गुफा सिर्फ सौ मीटर नीचे है, आगे पैदल ही जाना है। रास्ते में कुछ दुकानें लगी हुई हैं, जिनमें बांस के कप बना रहे हैं। उन्हीं को ये लोग चाय देने के प्रयोग में लाते हैं। अब तक आने जाने वाले लोग बताने लगे कि बहुत नीचे तक उतरना है। में पहले से ही बहुत थक चूका था और अब तो इन लोगों कि बात सुनकर मानसिक रूप से भी थकान लगने लगी।

बोर्रा की गुफा
Bora-caves
ऊपर से देखने से तो गुफा छोटी-सी ही लग रही है और सीढ़ियों से उत्तर ही रहे थे कि सामने बहती हुई एक नदी नजर आई। बहुत देर बाद एक अच्छा दृश्य दिखा। चलो अब आगे फिर उतरते हैं। अभी तक तो यह जगह गुफा जैसी नहीं लग रही, खूब विस्तार लिए हुए है और अभी बाहर से आने वाला उजाला भी पर्याप्त हैं, तो अच्छा ही लग रहा है। अब यहां से नीचे उतरते-उतरते कहीं पर संकरी लग रही है, तो कहीं पर चौड़ी। अब बाहर का उजाल तो नहीं दिख रहा, पर यहां रंग-बिरंगें प्रकाश कि व्यवस्था है जिससे यहां दिखने वाली आकृतियां बहुत रोचक लग रही हैं। एक जगह पर गुफा में बड़ा-सा छेद है, जिससे बाहर की रोशनी अंदर आ रही है, जो कि एक चमत्कार-सा लग रहा है। इतनी बड़ी गुफा और उसमें छेद। एक-दो जगह पर शिवलिंग एवं अन्य देवी-देवताओं की आकृति भी उभरी हुई हैं और उनके आगे पीछे पांडे पैसा कमाने को बैठे हैं।
अब बस थोड़ा-सा और उतरना है अंधेरा भी खूब गहरा चूका है, लेकिन रंग-बिरंग लाइट भी जल रही है। अरे ये क्या! इतना चौड़ा विस्तार है कि लग ही नहीं रहा हम किसी गुफा के अंदर हैं। ऐसा लग रहा है जैसे किसी घर के आगे आंगन होता है उसमें पहुंच गए हों। यहां पर उतनी लाइट नहीं थी। शायद जान-बूझकर नहीं होगी, जिससे वास्तविकता का आभास होता रहे। यहां चमगादड़ मंडरा रहे थे और उनकी आवाज ने एकांत को भंग किया हुआ था। गुफा के अंदर काफी सारे इंस्टैंट फोटोग्राफर भी घूम रहे थे, जो कि इतने अंधेरे में भी सुंदर-सुंदर तस्वीरें निकलने में सक्षम थे। चमगादड़ों के इधर-उधर टकराने से चुना पत्थर कि दीवारों से कुछ-कुछ कण इधर-उधर गिर रहे थे, जो कि फ्लैश लाइट लगा कर फोटो खींचे तो उनमें कुछ जगह पर धुंधलापन आ जाता है। किसी भी जगह नीचे उतरना जितना आसान होता है उतना ही कठिन ऊपर चढ़ना होता है। अब वापसी कि रहा पर चलना है, करीब पैंतालीस मिंट लग गए यहां से ऊपर पहुंचने में। अब थकने के साथ-साथ भूख भी लग आई तो हम बाहर बोर्रा केव की कैंटीन में चल दिए।
अरे यह क्या इन सब बातों के बीच में यह बताना हो भूल ही गया कि यह गुफाएं कैसे बनी हैं? चुना पत्थर की बनी ये गुफाएं विशाखापटटनम से 90 किमी, की दुरी पर स्थित है। अक्सर गुफाएं नदी किनारे ही बसी होती हैं, जैसे-पाताल भुवनेश्वर की गुफा जटा गंगा के समीप बसी है। ठीक इसी प्रकार बोर्रा की गुफा को गोस्थनी नदी का उदगम मानते हैं। कालांतर से नदी के पानी ने रिस-रिस कर इसके निर्माण में योगदान दिया होगा। समय-समय पर चुना पत्थर पानी में घुलता रहा होगा और उसने गुफा के अंदर विभिन्न प्रकार की आकृतियों का निर्माण कर डाला होगा। गुफा के इन रहस्यों के बारे में विचार-विमर्श करते करते चाय-नाश्ता भी निपट गया  और आगे बढ़ने का समय हो गया। झटपट टैक्सी में बैठे और विशाखापटटनम की तरफ चल पड़े।

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